पं.श्‍यामलाल चतुर्वेदी के कहिनी : रतनपुरहिन सियानिन

घाट घटवँधा, गली खोर परछी चौंरा, जउन लँग कोलबिल कइय्या गलबजार कस माते रथे तिहां जमों जान डारथें के ये लंग अवस के रतनपुरहिन सियानिन होबेच करही।
डहर चलती लइकनमन जउने लंग देखतिन तिहां दउंड़ के तिर मं आके गोहनाये लगतिन- ये बुढ़ीदाई ! एको ठन किस्सा कहानी कहि देना ओ ! ये डोकरी ये ममादाई ! आंय ओ ! एक ठन नान मुन कुछ कौह न ओ ! कभू तो डोकरी हांस भरय अउ कभू कभू कऊवा के भंसेड़ तिस-भडुवा भेट्टा होवा बेरा चिन्हें न कुबेरा जउने लंग पाथे घुर्री घंसे लागथे। ये का ये दाई ?
कइसन ये लइकन सत्ती नाचत हें। धन्न हे धन्न हे। आजकाल के लइकन कइसन उदबिदहा हो गईन चेट चेट चेट चेट करत हें। रस्दा नई रेंगे देत हें।
बेरा बुड़े ले आबो तब सुनाबे ? डोकरी हांस के कहितिस ह हो आहा रे आहा। कत्था सुनिहा अउ खजेना घलाव खाहा। फेर तो लइकन कुलके लगतिन। पांव परत हौं, बुढ़ी दाई के कहाई म चिहुर परे लगतिस।
तलाव नदिया जातिस तव पतोधिया मन चउज मढ़ातिन। कोनो गुड़री ल भिंजो देतिन, हंउली ल आने कती मढ़ातिन। लुगरा ल झींक देतिन। भई तो गै फेर का पूछना हे ? कहितिस – मोटियारी टूरी होवा। दुल्हा घर जाहा अउ ठेंगे पिटान खाहा तब तुंहर ये करकरी हर जाही। अभी मइके के चाउर ल माड़ी मोर के दूदी तिन तिन घौं चोंगलाय के खावत हावा तभे मिरगिन बरोबर मेंछरावत हावा। जमो चेटचेटाई सटक जाही छिनार हो। मसरमोटी माते हे बांडी मन ला।
घाट भर के जमो नहवइय्या सुआरी मन हांस भरँय। हांसी मसखरी के कुंहाहल म गझिन हो जावैं। रतनपुरहिन के गारी हर जमो ला कान के बारी कस लागय तेकरे बर ओला उसटँइय्या लेहे बिना कोनो के पेट के पानी नइ पचय।
रतनपुरहिन हर सेउक पंडित के दूसर बिहाई होके आये रहिस। सिअनहा के सुआरी होये के सेतिर, गांव भर के बड़का नता हो गईस। जादा उम्मर के मन देरानी बहुरिया हो गय रहिन। सियान मन बतावें जब रतनपुरहिन हर पठौनी होके आइस तब गांव भर मा देखनी हो गय रहिस। गहना गोटान म नदिया बइला कस लदाये ढार तिलरी नांगमोरी बहुंटा ककनी, बनवरिया, सरजावाला नथ, पटिया, कमरपट्टा तोड़ा पैरी जतका बेर छन्नक छन्नक
बाजत रेंगतिस देखनी हो जातिस। गोरी नारी एक बूंद पानी के नहवाऊ बिना मिलकी मारे देखत रहि जावैं। सियानिन होये म देखे ले लगय, के ये हर अपन उम्मर म कइसना सुघ्घर रहिस होही।
बछर दसक ऐंहवाती रहे पाइस तिहां जुच्छां हांथ होगे। अब तो आऊ कोनो छें कइय्या नई रहिगे ओइसने जनम के गोठ कहारिन, फेर अब तो आऊ उल्ला बिन नाथ के बइला कस ढिल्ला छुछिंद कुछु के संसो नहीं। न बन जाये बर न बाघ धरे बर। सियानिन के आघू ले कोनो चुप्पे नहकतिन तब ओझिया के दू बात गोठिआये बिन नइ रहितिस। गांव बस्ती म कोनो घर के मरनी हरनी, बर बिहाव छठ्टी बरही दुख सुख के कुछू काम होतिस, सियानिन ला पहुंची जाना रहय। बलाव देहे बर कोनो कभू भुला जातिन तभो सवांगे हबर के भले झंझेट लेतिस बद्दी दे लेतिस।
निचट निखुरखी छिन मा कोनो ल मसखरी मढ़ाके खल खल खल खल हांसे लगतिस अउ कोनो के दुख देखके तर तर आंसू ढारे लगतिस। लगय जइसे कनिहा म हांसी अउ रोवासी दुनो ल एकक कती खोंचे हे। संझा जुआर तेल नून बिसाये बनिया दुकान जातिस तव भंइसा मुंधियार के घर लहुटतिस। घर म रहितिस तव कोनो न कोनो बइठेच रहितिन। नान नान लइकन बर चना, मुर्रा, लाई, बिही तिल के लडुवा, बोइर कहत हौं न कुछू न कुछू राखेच रइतिस। कहय- राम के चिराई राम के खेत। खाले चिरइय्या भर भर पेट। जमो जिनिस भगवान के आय ओकरे जिनिस अउ ओकरे बनाये आदमी। जियत भर खाना अउ खवाना। हांस लेवा गोठिया लेवा। ये चोला हर पानी भरे खाल आय। का ठिकाना येकर ? पानी के फोटका तो आय कोन जानत हे कब फुट जाही ?
सांझ होतिस तहां पारा के लइकन डुलियाये लगँय। आवा रे भडुवा रांड़ी होवा कइके उन ला हॉंसत हॉंसत बइठारतिस। फेर खाई खजेना देके तिहां फेर किस्सा कहिनी के गुढ़वा ला पुरुत पुरुत उसेलतिस। सुनइय्या मन अब्बक हो जावैं कतका किस्सा जनउला गीद जमोला कइसे ये डोकरी सुरता राखे हावै ? होय न होय ये कर कंठ म सरसती बइठे होही। बिना भुलाये टप टपउहन कहि डारथे। डुंड़ी रक्सिन, पैली पैला, बेंदरा कोलिहा, अड़हा कमिया, लंगटा बाम्हन, बिघवा बघवा, सरहू तेली, राजारानी, सतबहिनिया, कतका कतका ला मुंहअखरा बिना, अटके भुलाये धड़घड़उहन कहि देथे। रोज के ओकर ऐही बुता बने हे।
सुरुज नरायेन के गोलवा चक्का उत्ती ले निकलथे, बुड़ती म ललिया के बुड़ जाथे। फेर बिहान होतेच ओही धर्रा ल धर लेथे। जस तस ओकर आना जाना चलत हे तस तस आदमी जम राजा के लकठा कती तिरियावत जाथे। मनसे मन गम नई पावैं। अपन उम्मर अउ आन के धन दोगानी हर अघात अकन दिखथे। तलाव के मँगरा कस काल हर घटबँधा तिर, चुपे चुप चप्प ले धरे बर तिरियावत रथे, गम नई मिलय, दिन जात बेरा नइ लागय।
एक दिन मनटोरा के बड़े बेटी के मंझिला छोकरा हर अपन ममा दाई घर आइस। लइकाई के पइघे तो आय पहुंचगे रतनपुरहिन ममा दाई घर। पयलगी करके कहिस मोला चिन्हत हस ममादाई ? सियासिन हर गोड़ मुड़ ले देखिस माथा ल गुंझिया के गुनिस फेर आकब नइ पाइस। बेटा तैं कोन अस रे ? देखे हंव कस लगत हे फेर चिन्हें नइ सकत हौं बेटा ? सियान पन म घियान हर धुंधिरिया जाथे रे। मै तोर दुलौरिन के बेटा औं बुढी दाई। अतका ल सुनतेच आंसू डबडबागे। मया हर लेवना कस टघलगे। चीन्ह डारेंव बेटा ! फेर तो पोटार के चूमा लेइस अउ कहिस-कस रे मनबोधी तैं तो घुरवा के खेंड़हा कस कइसन डंग-डंग ले बाढ़ गये हस रे ? नानकन रहे तव कइसन टेंकहा सतनच्चा तिरबेंगला रहे। अब तोला कइसे चिन्हतेंव। रहिबे तोर बर पिढ़वा लानत हौं कहिके ओसारी ले धरा पछरा जाके लुगरा के अंचरा म पोंछत पोछत लान के मढ़ाइस। बइठ ले बेटा। घर के सबो झन के एकेक ठन हाल चाल पूछिस अउ मलिया म गुर पागे लाई लानके मढ़ाके कथे, ले पानी पीले। तूंमन तो सहर म रोज खोवा पेंड़ा खात होहा। हमर तो येही खाजा खुरमा ये। मनबोधी हर मुसुर मुसुर खात खात कथे-बुढ़ी दाई तोर सो कुछू कुछू बात पूछे बर आये हौं, बताहौं कइबे तव पूछिहौं। डोकरी दाई कथे- पूछ ले का पूछबे तौ ? तैं तो पुलुस दरोगा कस मोर परछो लेबे
कारे? पढ़े न गुने, करिया अक्‍क्षर भंइस बरोबर। मोला चकोरबे झन। सोझ सोझ पूछबे नइ तो फेर जानथस न मोला। बहिरी के मुठिया म देते दैहों। मनबोधी हांस भरिस।
बूढ़ी दाई। तइहा के दिन अउ अबके समे म तोला का का फरक लागथे ?
मोला पूछत हस तब लिख ले तोर कागज म, तइहा के बात ल बइहा लेगे। काला काला कहौं रे बेटा ! पहिली गांव भर के रहइय्या चाहे कुछू जात पांत के रहैंय एक परवार असन सबके दुख सुख के संगी रहैंय। आनके बूता ला जमो जुरके गोबरधन कस अलगा लेवँय, अउ अब तो एक दूसर के चारी, अनदेखनई, झगरा झांसा, खीक्क होगे बेटा ! मनखे तो आघू ले बाढ़ गइन फेर मन हर सांकुर होगे जइसना चपलाई के मारे खोल गली के हाल हे। कुछू कोनो घर होतिस तव बिन बांहटे कोनो नई खात रहिन अब तो सब अपखया, आंखी ओधा करके कलेचुप खावत हें। तइहा के मन पढ़े लिखे कमती रहिन फेर कढ़े जादा रहिन। न तो कोनो ल ठगा फुसाड़ी करँय न दगा दोगलाई करें। एक बोलिया, सोझवा, अपन पसीना ओगार के कमावैं अउ जउन जुरय तेला, मिल बहांट के खावैं, सन्‍तोषी रहिन। तोला बताहौं तव तैं पतियाबे नहीं। सोन चांदी के गहना रुपिया पैसा कुच्छू कोनो लंग गिरे परे पातिन तव खोज के गोसइय्या ल देवँय। चोर चंडाल हर अलग चिन्हा जावे अब तो कुछू गमे नइ मिलय। कोन का हे का कहत हे अउ का करत हे। आन ला सिखौना देय, अपन बइठ रवनिया लेय के जमाना आगे। जमे सिखोने बाला होगैं धरोइय्या पतरिया गइन। चटरहा लपरहा के अंकरी बेचावत हे चुप रहइय्या के चना घुनावत हे बाबू। जाने रे मनबोधी ! मनबोधी कहिस – दाई ! आघू ले कतको नावा नावा किसम के चीज होइस घलाव तो है। तोर मोटर चलत हे, गाड़ी दउंड़त हे, मंदरसा बनगे सड़क, अस्पताल, कतको सुभीता के बन्दोबस बनिस घलाव तो हय ? डोकरी हांस भरिस – कथे, कहे बर सब होगे फेर एको ठन म रंग ढ़ंग हावै ? कतका आघू रुख राई रहय अउ अब ? कहां नंदागे ? धड़ धड़उहन जउने पावत हें अपन बाप कस चीज कटाईच बुता करत हें। हेल्ला होगे चारों मुड़ा। रस्दा रेंगय्या छइंहावैं, चिरई चुरगुन ओकर फर ला खावैं। मउहा, चार जामुन, तेंदू आघू कतका खावन अउ अब नोहर होगे। सुन तो तैं मोर डोकरी के बात ला तोर सहर म जाके जमो झन ला बता दे, के रतनपुरहिन बुढ़ीदाई हर कहे हे के – सत्ती झन नाचा। कतको कुदिहा तब भुंइये म आके जोगाहा। तपिहा तव खपिहा। ठग विद्या ल छोड़के अपन अपन चाल चलन ला सुधारा। पसीना गार के कमाई करा, अउ मिल बहांट के खावा। लपर लपर झन मारा। सोझ रसदा म रेंग के तुहूं सुख पावा अउ आनो ला सुख देवा। तुंहर सहर म रे बाबू। एक कती तो अपखया मन भँइसा भँइसिन कस मोटाये मसमोटइ के मारे मरत हे, तब दूसरी कती कतको झन दुनू जुवार भर पेट भात बासी बरोबर पाये बर तरसत हें। मनबोधी कहिस – कस बुढीदाई तोला गद्‌दी म बइठार देबो तब तें कइसे राज चलाबे ? भेठ्हा नहि तो, मोही ला कुड़काये बर धरलिस। हमर अब का हे बेटा। नंदिया तिर के रुखुवा तो हावन। कब चल देबो का ठिकाना हे ? फेर अतका कइहौं रे – छल छिद्दर ल छोड़के, अपन मेहनत के कमाई ला खाके अउ खवाके, चार दिन के जिनगानी, ल बने बने जमो जीयँय आनो ल जिये देवँय। पानी ल मतलावैं झन, सफ्फा पानी पियँय आउ आनो ल पिये देवँय। हांसे अउ हँसवावैं, फेर फांसे झन फंसवावैं। झन रोवँय झन रोवावँय, अउ संसार के सिरजोइय्या भगवान के गुन ल गावँय अउ गवावँय। मनबोधी जा, अब तोहूला अगोरत होहीं घर म, एक ठोम्हा महूं अब राधिहों पसाहौं।

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